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टीकाकरण वह प्रक्रिया है, जिसमें टीके के जरिये बच्चे का किसी जानलेवा बीमारी से बचाव किया जाता है या उसके शरीर में बीमारी से बचाव की ताकत पैदा होती है। टीकाकरण जानलेवा बीमारियों से बच्चों की रक्षा करने में सहायता करता है। यह दूसरे लोगों को बीमारी की चपेट में आने से बचने में भी मदद करता है।

टीके बच्चे के शरीर में बीमारियों से लड़ने की ताकत पैदा करते हैं, जिन्हें एंटीबोडीज़ कहते हैं। इस तरह वे बच्चे के शरीर को बीमारियों का मुकाबला करने के लिए तैयार करते हैं। इससे बच्चे के शरीर की बीमारियों से लड़ने वाली प्रणाली में सुधार होता है।

बच्चे को नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या सरकार द्वारा आयोजित टीकाकरण सत्र में टीका लगवाया जा सकता है। टीकाकरण सेवाएं निजी स्वास्थ्य केंद्रों और प्राइवेट डॉक्टर्स द्वारा भी उपलब्ध करायी जाती हैं।

ये टीके सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों में और सम्‍पूर्ण टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के तहत आयोजित टीकाकरण सत्रों में मुफ्त लगाये जाते हैं।

सम्पूर्ण टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के तहत 7 जानलेवा बीमारियों के टीके लगाये जाते हैं। इन बीमारियों में - तपेदिक (Tuberculosis), पोलियो (Poliomyelitis), हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis B), डिप्थीरिया (Diphtheria), काली खांसी (Pertussis), टेटनॅस (Tetanus) और खसरा (Measles) शामिल हैं। कुछ चुनिंदा राज्यों और जि़लों में हीमोफिलस इंफ्लूएंज़ा टाइप बी (Haemophilus Influenzae type B) और जापानी इन्सेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis) के भी टीके लगाये जाते हैं।

ज्यादातर बच्चों में, टीकाकरण का कोई दुष्‍प्रभाव नहीं होता। हालांकि कुछ बच्चों को टीके वाली जगह पर मामूली दर्द, सूजन और/या लाली हो सकती है, जो कुछ दिन में ठीक हो जाती है। हालांकि टीकाकरण बेहद सुरक्षित है, लेकिन किसी भी अन्य दवा की ही तरह, टीके के भी दुष्‍प्रभाव हो सकते हैं।

राष्‍ट्रीय टीकाकरण सारणी के अनुसार बच्चे को जन्म पर, 6, 10 और 14 हफ्ते और 9 महीने का होने पर टीका लगवाया जाना आवश्‍यक है। बूस्टर डोसिज़ (अतिरिक्त खुराकें) 16-24 महीने और उसके बाद 5 वर्ष की उम्र में दी जाती हैं।

स्वस्थ बच्चों का टीकाकरण करना भी आवश्‍यक है, क्‍योंकि टीकाकरण कराने से बीमारी के हमला करने से पहले ही बच्चों को सुरक्षा मिल जाती है। अगर आप अपने बच्चे के बीमार पड़ने का इंतज़ार करेंगे, तो टीकों के असर करने के लिए बहुत देर हो जाएगी।

जी हां, पल्स पोलियो अभियानों के दौरान, यह जरूरी है कि 5 साल से छोटे सभी बच्चों को ओपीवी (OPV) की अतिरक्त खुराक पिलायी जाए।

आईपीवी का मतलब इनैक्टिवैटिड पोलियोवायरस है। आईपीवी में पोलियोवायरस के तीनों प्रकारों (या किस्‍मों) के निष्क्रिय (मृत) पोलियोवायरस स्‍ट्रैन्‍स होते हैं और इन्‍हें इंजैक्‍ट किए जाने वाले टीकों के रूप में दिया जाता है।

जी हां, आईपीवी सुरक्षित टीकों में से एक है। यह तीनों तरह के पोलियोवायरस से बच्‍चों की रक्षा करता है।

जी नहीं, आईपीवी (इंजैक्‍शन), ओपीवी (पोलियो ड्रॉप्‍स ) की जगह नहीं लेगा। ओपीवी की खुराक नियमित टीकाकरण के अंग के रूप में और पोलियो राउन्‍ड्स के दौरान पिलायी जाती रहेगी। आईपीवी, ओपीवी की तीसरी खुराक के अलावा दिया जाएगा और उसी विजिट में दिया जाएगा।

भारत को पोलियो मुक्‍त घोषित किये जाने के बावजूद, अफगानिस्‍तान और पाकिस्‍तान जैसे पड़ोसी देशों में वाइल्‍ड पोलियोवायरस अब तक मौजूद है। पोलियोवायरस एक देश से दूसरे देश में जाने वालों के जरिये भी प्रवेश कर सकता है। जब तक दुनिया भर के देशों से पोलियोवायरस का सफाया नहीं हो जाता, तब तक पोलियो के दोबारा पनपने और दोबारा सं‍क्रमित करने का खतरा बरकरार है। दुनिया भर से पोलियो का सफाया करने की दिशा में यह एक महत्‍वपूर्ण कदम है, जिसे सभी देशों द्वारा लागू किया जा रहा है।

जब आईपीवी इंजैक्‍शन और ओपीवी की तीसरे खुराक एक साथ दी जाती है, तो बच्‍चे और समाज, दोनों की पोलियो से दोहरी हिफाजत होती है। आईपीवी और ओपीवी बच्‍चों को अतिरिक्‍त सुरक्षा उपलब्‍ध कराते हैं, ये दोनों मिलकर पोलियोवायरस के दोबारा पनपने और उसे दोबारा संक्रमित करने से रोकते हैं।

आईपीवी और ओपीवी को एक साथ दिया जाना सुरक्षित है। ऐसे बहुत से देश हैं, जो पहले से ही ओपीवी और आईपीवी को अपने नियमित टीकाकरण कार्यक्रम के अंग के रूप में दे रहे हैं।

जी हां, नियमित टीकाकरण के जरिये आईपीवी और ओपीवी दिलाने के बाद भी बच्‍चे को पल्‍स पोलियो अभियानों के दौरान हर हाल में ओपीवी खुराक दिलाया जाना जारी रखना चाहिए। इससे बच्‍चे की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी तथा बच्‍चे और समाज की पोलियों से निरंतर रक्षा होती रहेगी।